DABUR was founded by a Bengali doctor Mr S K Burman in 1884 to manufacture ayurvedic medicine.DABUR is derived from DA(ktar) BUR(man).It is INDIA's largest ayurvedic medicine manufacturer.
समय सुबह का 7 बजकर पचास मिनट हुआ था। मै बरूआचक स्टेशन पर नाईट शिफ्ट के लगभग समाप्ति पर था।तभी दिन के शिफ्ट का अधीनस्थ कर्मचारी उनसठ वर्षीय श्री राजपति का कार्यालय मे प्रवेश होता है।तभी अनायास ही हमारी नजर श्री राजपति के उडलैंड के बादामी रंग के जूते पर टिक गया।तभी हमने मजाक करने के लिए कह दिया कि राजपति तो पच्चीस साल के जवान आज दिख रहे है।उसने हमारे मजाक का बिना कोई प्रत्युत्तर दिए मुस्कुरा दिया।फिर उस दिन बात आई गई हो गई और मै भी ड्यूटी शिफ्ट से छुट गया। अगले दिन वो शख्स फिर वही जूता पहन कर आया या नही,मुझे ध्यान नही रहा।परन्तु मेरे द्वारा निर्विकार भाव से किए गए उस मजाक का राजपति पर शायद गहरा असर हुआ जिससे मै अनभिज्ञ था।फिर कुछ दिन बाद राजपति की ड्यूटी मेरे दिन के शिफ्ट मे साथ मे लगी।उस दिन किसी ने फोन पर मुझसे उसका यू ही हालचाल पूछा।फोन पर ही दुर्भाग्यवश राजपति के सामने ही मेरे मुँह से फिर मजाक निकल गया।फिर क्या था।लोहा गरम था ही।हमारे पुनः मजाक का प्रतिक्रिया होना लाजिमी था सो हुआ।मै भौचक रह गया। उस शख्स के मन मे प्रतिक्रिया शायद इस बात को लेकर था कि एक छोटे कर्मचारी क्या अच...
मलयाला मनोरमा (Malayala Manorama) मलयाला मनोरमा (Malayala Manorama) भारत का एक प्रमुख मलयालम भाषा का दैनिक समाचार पत्र है, जिसकी स्थापना वर्ष 1888 में कंधाथिल वर्गीज़ मापिल्लई ने की थी। इसका मुख्यालय केरल राज्य के कोट्टायम शहर में स्थित है। यह समाचार पत्र केवल केरल में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में मलयालम भाषी समुदाय के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। मलयाला मनोरमा का प्रकाशन मलयाला मनोरमा ग्रुप द्वारा किया जाता है, जो भारत के सबसे बड़े मीडिया समूहों में से एक है। यह समाचार पत्र राजनीति, समाज, खेल, शिक्षा, विज्ञान, अंतरराष्ट्रीय समाचार, और सांस्कृतिक विषयों को गहराई से कवर करता है। इसकी लेखन शैली सरल, स्पष्ट और पाठकों के अनुकूल होती है। मलयाला मनोरमा की सबसे बड़ी विशेषता इसका विशाल पाठक वर्ग है। यह भारत के सबसे अधिक पढ़े जाने वाले समाचार पत्रों में से एक है। इसकी लोकप्रियता का एक प्रमुख कारण इसकी विश्वसनीयता, संतुलित रिपोर्टिंग और जनसरोकार से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता देना है। समाचार पत्र के अलावा मलयाला मनोरमा ग्रुप कई अन्य पत्रिकाएँ भी प्रकाशित करता है, जैसे 'द वीक' (अ...
सिक्की कला सिक्की कला बिहार की प्रसिद्ध लोक एवं हस्तशिल्प कलाओं में से एक है। इसका विकास मुख्य रूप से बिहार के मिथिला क्षेत्र में हुआ है। इस कला में सिक्की नामक सुनहरे रंग की घास का उपयोग करके विभिन्न प्रकार की आकर्षक वस्तुएँ बनाई जाती हैं। सिक्की एक प्रकार की प्राकृतिक घास है, जिसे सुखाकर और रंगकर कलात्मक रूप दिया जाता है। मिथिला की ग्रामीण महिलाओं ने इस कला को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखा है। सिक्की कला से टोकरियाँ, डिब्बे, पर्स, चटाइयाँ, खिलौने, गुड़िया, आभूषण रखने के डिब्बे, कलश, पूजा की वस्तुएँ तथा सजावटी सामान बनाए जाते हैं। इन वस्तुओं पर मोर, मछली, हाथी, पक्षी, पेड़-पौधे और ज्यामितीय आकृतियों जैसी पारंपरिक डिजाइनों का प्रयोग किया जाता है। कई उत्पादों में प्राकृतिक रंगों के साथ लाल, हरा, पीला और नीला रंग भी दिखाई देता है। सिक्की शिल्प बनाने के लिए घास को पहले सुखाया जाता है। इसके बाद उसे आवश्यकतानुसार रंगा जाता है और एक विशेष प्रकार की पतली घास या मूंज के आधार पर बुनाई की जाती है। कुशल कारीगर अपनी कल्पना और बारीक हाथ के काम से साधारण घास को सुंदर कलाकृति में बदल देते हैं। सिक्की...
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें