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FOLK DANCE OF AFRICA

 अफ्रीका के लोक नृत्य अफ्रीका का लोक नृत्य वहाँ की सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक जीवन और आध्यात्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह महाद्वीप विविध जनजातियों, भाषाओं और रीति-रिवाजों से समृद्ध है, और यही विविधता उसके लोक नृत्यों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। अफ्रीकी लोक नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि वे समुदाय की भावनाओं, इतिहास और विश्वासों को अभिव्यक्त करने का माध्यम भी हैं। अफ्रीकी लोक नृत्यों में शरीर की गतिशीलता, लयबद्ध कदम, कंधों और कमर की तीव्र हलचल प्रमुख होती है। ढोल, ड्रम, जेम्बे और अन्य पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ताल पर नर्तक सामूहिक रूप से नृत्य करते हैं। नृत्य के दौरान गायक, वादक और नर्तक आपस में संवाद करते हैं, जिससे एक जीवंत और ऊर्जावान वातावरण बनता है। कई नृत्य धार्मिक अनुष्ठानों, वर्षा की कामना, फसल उत्सव, विवाह और जन्म जैसे अवसरों से जुड़े होते हैं। अफ्रीका के प्रसिद्ध लोक नृत्यों में दक्षिण अफ्रीका का गमबूट डांस, पश्चिमी अफ्रीका का जेम्बे डांस, केन्या और तंज़ानिया का अडुमु (मसाई जम्पिंग डांस) तथा इथियोपिया का एस्किस्ता प्रमुख हैं। इन नृत्यों में पारंप...

ORNAMENTS

 आभूषण (Ornaments) आभूषण मानव सभ्यता का एक अभिन्न अंग रहे हैं। प्राचीन काल से ही लोग शरीर की सजावट के लिए विभिन्न प्रकार के आभूषणों का प्रयोग करते आए हैं। आभूषण न केवल सौंदर्य बढ़ाते हैं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व भी रखते हैं। भारत में आभूषणों को विशेष स्थान प्राप्त है और इन्हें परंपरा, धर्म तथा रीति-रिवाजों से गहराई से जोड़ा जाता है। भारत में आभूषणों का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर वैदिक काल तक सोने, चांदी, तांबे और कीमती पत्थरों से बने आभूषणों के प्रमाण मिलते हैं। विभिन्न कालखंडों में आभूषणों की शैली और डिजाइन में परिवर्तन होता रहा, लेकिन उनका महत्व कभी कम नहीं हुआ। आज भी विवाह, त्योहारों और धार्मिक अवसरों पर आभूषण पहनना शुभ माना जाता है। आभूषणों के प्रकार बहुत विविध हैं। इनमें हार, अंगूठी, कंगन, चूड़ियाँ, झुमके, पायल, नथ, मांग टीका और कमरबंध प्रमुख हैं। ये आभूषण सोना, चांदी, प्लेटिनम, हीरे, मोती और अन्य रत्नों से बनाए जाते हैं। भारत के अलग-अलग राज्यों में आभूषणों की विशिष्ट शैलियाँ देखने को मिलती हैं, जैसे राजस्थान के कुंदन आभूषण, दक्षिण भा...

BANGLES

 चूड़ियाँ (Bangles) चूड़ियाँ भारतीय संस्कृति और परंपरा का एक महत्वपूर्ण आभूषण हैं। इन्हें प्रायः कलाई में पहना जाता है और ये सौंदर्य, सौभाग्य तथा नारीत्व का प्रतीक मानी जाती हैं। भारत के विभिन्न राज्यों में चूड़ियों के अलग-अलग रूप, रंग और परंपराएँ देखने को मिलती हैं। विवाहित महिलाओं के लिए चूड़ियाँ पहनना शुभ माना जाता है और कई क्षेत्रों में यह सुहाग की निशानी होती हैं। प्राचीन काल से ही चूड़ियों का प्रयोग होता आ रहा है। सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाइयों में भी चूड़ियों के अवशेष मिले हैं, जिससे इनके ऐतिहासिक महत्व का पता चलता है। पहले चूड़ियाँ मिट्टी, शंख, तांबे और कांच से बनाई जाती थीं, जबकि आजकल सोना, चांदी, लाख, प्लास्टिक, फाइबर और रत्नों से सजी आकर्षक चूड़ियाँ भी प्रचलन में हैं। बदलते समय के साथ इनके डिज़ाइन और शैली में भी काफी विविधता आई है। चूड़ियों का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व भी है। त्योहारों, विवाह, करवा चौथ, तीज और अन्य मांगलिक अवसरों पर महिलाएँ विशेष रूप से चूड़ियाँ पहनती हैं। उत्तर भारत में लाल और हरी चूड़ियाँ लोकप्रिय हैं, वहीं राजस्थान की लाख की चूड़ियाँ और हैदराबाद की क...

DEVI SUBHADRA

 देवी सुभद्रा – परिचय और महत्व देवी सुभद्रा हिंदू धर्म में पूजनीय देवी हैं और भगवान श्रीकृष्ण तथा बलराम की बहन मानी जाती हैं। उनका जन्म रोहिणी देवी की कोख से हुआ था। सुभद्रा को सौम्यता, करुणा और मंगल का प्रतीक माना जाता है। वे विशेष रूप से ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ और बलभद्र के साथ विराजमान हैं, जहाँ उनकी पूजा अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ की जाती है। महाभारत काल में देवी सुभद्रा का विशेष स्थान है। उनका विवाह अर्जुन से हुआ था, जो भगवान कृष्ण के प्रिय मित्र और पांडवों में से एक थे। सुभद्रा और अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु महाभारत युद्ध के महान वीर थे। अभिमन्यु की वीरता और बलिदान सुभद्रा के मातृत्व और संस्कारों की महिमा को दर्शाते हैं। देवी सुभद्रा को शक्ति और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। वे नारी शक्ति के सौम्य रूप का प्रतिनिधित्व करती हैं, जहाँ धैर्य, प्रेम और त्याग का भाव प्रमुख है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सुभद्रा की उपासना से पारिवारिक सुख, संतुलन और समृद्धि प्राप्त होती है। पुरी की रथ यात्रा में देवी सुभद्रा की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती है। ...

RATH YATRA OF PURI

 पुरी की रथ यात्रा पुरी की रथ यात्रा भारत के सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध धार्मिक उत्सवों में से एक है। यह यात्रा ओडिशा राज्य के पुरी नगर में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को समर्पित है। यह पर्व हर वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इस अवसर पर देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी पहुँचते हैं। रथ यात्रा का मुख्य आकर्षण तीन विशाल रथ होते हैं, जिनका निर्माण हर वर्ष नए सिरे से किया जाता है। भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष, बलभद्र का रथ तालध्वज और देवी सुभद्रा का रथ दर्पदलन कहलाता है। ये रथ लकड़ी से बनाए जाते हैं और रंग-बिरंगे कपड़ों, चित्रों और प्रतीकों से सजाए जाते हैं। श्रद्धालु रस्सियों के सहारे इन रथों को खींचते हैं, जिसे अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपने मुख्य मंदिर से निकलकर गुंडिचा मंदिर जाते हैं, जिसे उनकी मौसी का घर माना जाता है। यहाँ वे कुछ दिनों तक विश्राम करते हैं और फिर बहुड़ा यात्रा के माध्यम से वापस अपने मंदिर लौटते हैं। मान्यता है कि इस यात्रा में भाग लेने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प...

FAMOUS SANTOOR PLAYERS

 भारत में संतूर वादन को लोकप्रिय और प्रतिष्ठित बनाने में कई महान कलाकारों का योगदान रहा है। भारत के प्रमुख प्रसिद्ध संतूर वादक निम्नलिखित हैं— भारत के प्रसिद्ध संतूर वादक 1. पंडित शिवकुमार शर्मा पंडित शिवकुमार शर्मा भारत के सबसे प्रसिद्ध संतूर वादक माने जाते हैं। उन्होंने संतूर को लोक वाद्य से उठाकर शास्त्रीय संगीत के मंच पर प्रतिष्ठा दिलाई। उनकी वादन शैली, राग प्रस्तुति और नवाचारों ने संतूर को वैश्विक पहचान दिलाई। 2. राहुल शर्मा राहुल शर्मा पंडित शिवकुमार शर्मा के पुत्र हैं और आधुनिक संतूर वादन के प्रमुख कलाकार हैं। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ फ्यूज़न संगीत में भी संतूर को नई पहचान दी है। 3. भजन सोपोरी पंडित भजन सोपोरी कश्मीर के प्रसिद्ध संतूर वादक थे। उन्होंने सूफी और कश्मीरी लोक संगीत को संतूर के माध्यम से प्रस्तुत किया और संतूर परंपरा को समृद्ध किया। 4. तरुण भट्टाचार्य पंडित तरुण भट्टाचार्य संतूर वादन के एक प्रमुख नाम हैं। उनकी शैली में गहराई, तकनीकी कुशलता और रागों की सुंदर अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। 5. देवेंद्र शर्मा देवेंद्र शर्मा संतूर वादन के वरिष्ठ कलाका...

SHIV KUMAR SHARMA

 पंडित शिवकुमार शर्मा – जीवन और संगीत योगदान पंडित शिवकुमार शर्मा भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान संतूर वादक थे। उनका जन्म 13 जनवरी 1938 को जम्मू (तत्कालीन जम्मू-कश्मीर) में हुआ। उन्होंने संतूर जैसे लोक वाद्य को भारतीय शास्त्रीय मंच पर प्रतिष्ठा दिलाकर उसे एकल वादन के योग्य बनाया। उनके पिता पंडित उमा दत्त शर्मा स्वयं एक विद्वान संगीतज्ञ थे, जिनके मार्गदर्शन में शिवकुमार शर्मा ने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। शिवकुमार शर्मा ने कम आयु में ही संतूर वादन का गहन अभ्यास आरंभ कर दिया था। उन्होंने संतूर के तारों की संख्या और वादन शैली में नवाचार कर इसे शास्त्रीय संगीत के अनुकूल बनाया। उनकी वादन शैली में माधुर्य, लयात्मकता और रागों की स्पष्टता प्रमुख रही। उनके संतूर से निकलने वाले स्वर श्रोताओं को आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराते थे। उन्होंने देश-विदेश में अनेक प्रतिष्ठित संगीत समारोहों में प्रस्तुति दी और भारतीय शास्त्रीय संगीत को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। पंडित शिवकुमार शर्मा ने कई पश्चिमी संगीतकारों के साथ भी प्रयोग किए, जिससे भारतीय संगीत का वैश्विक विस्तार हुआ। उनके सुपुत्र राहु...