GAHAT KI DAL
गहत की दाल
गहत की दाल उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्रों में लोकप्रिय एक पारंपरिक और पौष्टिक दाल है। इसे कुल्थ की दाल भी कहा जाता है। गहत एक प्रकार की कठोर फलियों वाली दाल है, जिसका रंग सामान्यतः भूरा या गहरा लाल-भूरा होता है। पहाड़ी क्षेत्रों में सदियों से इसका उपयोग पारंपरिक भोजन के रूप में किया जाता रहा है। इसका स्वाद हल्का मिट्टी जैसा और विशिष्ट होता है।
गहत की दाल को अच्छी तरह धोकर कुछ घंटे भिगोया जाता है और फिर प्रेशर कुकर में पकाया जाता है। इसमें नमक, हल्दी, धनिया, जीरा, अदरक और लहसुन जैसे मसाले डालकर स्वादिष्ट दाल तैयार की जाती है। पहाड़ी शैली में इसमें जख्या का तड़का भी लगाया जाता है, जो इसके स्वाद और सुगंध को खास बना देता है। गहत की दाल को चावल, रोटी या मंडुवे की रोटी के साथ खाया जाता है।
पोषण की दृष्टि से गहत की दाल महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसमें प्रोटीन, फाइबर, आयरन, कैल्शियम और अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसमें मौजूद फाइबर पाचन तंत्र के लिए उपयोगी होता है और लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस कराने में मदद कर सकता है। पारंपरिक रूप से इसे सर्दियों में विशेष रूप से पसंद किया जाता है।
गहत से केवल दाल ही नहीं, बल्कि गहत का फाणू, गहत की चुड़कानी और गहत के पराठे जैसे कई पहाड़ी व्यंजन भी बनाए जाते हैं। उत्तराखंड के ग्रामीण भोजन में इसका विशेष स्थान है। आज पारंपरिक पहाड़ी खान-पान के प्रति बढ़ती रुचि के कारण गहत की दाल देश के अन्य हिस्सों में भी लोकप्रिय हो रही है। यह स्वाद, परंपरा और पौष्टिकता का सुंदर संगम है।
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