JHANGORA
झंगोरा: उत्तराखंड का पौष्टिक अनाज
झंगोरा उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में उगाया जाने वाला एक पारंपरिक अनाज है। इसे अंग्रेजी में Barnyard Millet और हिंदी में सामान्यतः सांवा या सांवा का चावल भी कहा जाता है। पहाड़ी जीवन और स्थानीय कृषि संस्कृति में झंगोरा का विशेष महत्व रहा है। कम उपजाऊ भूमि, कम पानी और कठिन पहाड़ी परिस्थितियों में भी इसकी खेती आसानी से की जा सकती है।
झंगोरा के दाने छोटे, हल्के और सफेद या हल्के भूरे रंग के होते हैं। इससे मुख्य रूप से झंगोरे की खीर, भात, पुलाव और अन्य पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। उत्तराखंड में झंगोरे की खीर विशेष रूप से प्रसिद्ध है। दूध में पकाकर बनाई गई यह खीर स्वादिष्ट होने के साथ-साथ ऊर्जा देने वाला पारंपरिक भोजन मानी जाती है।
पोषण की दृष्टि से भी झंगोरा महत्वपूर्ण है। इसमें कार्बोहाइड्रेट के साथ फाइबर, प्रोटीन और कई आवश्यक खनिज पाए जाते हैं। यह ग्लूटेन-फ्री अनाज है, इसलिए ग्लूटेन से परहेज करने वाले लोगों के लिए भी उपयोगी विकल्प हो सकता है। इसमें मौजूद फाइबर पाचन तंत्र के लिए लाभकारी होता है। हालांकि किसी भी अनाज की तरह इसका सेवन संतुलित मात्रा में करना चाहिए।
झंगोरा पर्यावरण की दृष्टि से भी उपयोगी फसल है। इसे धान की तुलना में कम पानी की आवश्यकता होती है और यह पहाड़ी क्षेत्रों की जलवायु के अनुकूल है। आज मोटे अनाज और मिलेट्स को बढ़ावा मिलने के कारण झंगोरा फिर से लोगों के बीच लोकप्रिय हो रहा है।
इस प्रकार झंगोरा केवल उत्तराखंड की पारंपरिक खाद्य विरासत का हिस्सा नहीं है, बल्कि पौष्टिक, टिकाऊ और स्थानीय कृषि को बढ़ावा देने वाला महत्वपूर्ण अनाज भी है।
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