SAHYADRI MOUNTAIN RANGE
सह्याद्रि पर्वतमाला (पश्चिमी घाट) – परिचय
सह्याद्रि पर्वतमाला, जिसे पश्चिमी घाट भी कहा जाता है, भारत की सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण पर्वत श्रेणियों में से एक है। यह पर्वतमाला गुजरात से लेकर महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु तक लगभग 1,600 किलोमीटर की लंबाई में फैली हुई है। सह्याद्रि पर्वतमाला अरब सागर के समानांतर स्थित है और भारत की जलवायु, पर्यावरण तथा प्राकृतिक संतुलन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
भौगोलिक दृष्टि से सह्याद्रि पर्वतमाला दक्कन के पठार की पश्चिमी सीमा का निर्माण करती है। यह पर्वतमाला मानसूनी पवनों को रोककर पश्चिमी तट पर भारी वर्षा कराती है, जबकि इसके पूर्वी भाग अपेक्षाकृत शुष्क रहते हैं। इसी कारण यह पर्वत श्रेणी भारत की प्रमुख नदियों का उद्गम स्थल भी है। गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, तुंगभद्रा और भीमा जैसी नदियाँ यहीं से निकलती हैं, जो देश के विभिन्न भागों को जल प्रदान करती हैं।
सह्याद्रि पर्वतमाला जैव विविधता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इसे यूनेस्को द्वारा विश्व प्राकृतिक धरोहर का दर्जा दिया गया है। यहाँ घने सदाबहार वन, शोलाग्रास भूमि और विविध प्रकार के वनस्पति एवं जीव-जंतु पाए जाते हैं। नीलगिरि तहर, शेर, हाथी, बाघ, दुर्लभ पक्षी और औषधीय पौधे इस क्षेत्र की विशेषता हैं। यह क्षेत्र कई राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों का घर है।
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी सह्याद्रि पर्वतमाला का महत्व अत्यधिक है। यहाँ अनेक प्राचीन किले, गुफाएँ और धार्मिक स्थल स्थित हैं। मराठा साम्राज्य के समय यह पर्वतमाला रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रही। प्राकृतिक सौंदर्य, जैव विविधता और ऐतिहासिक विरासत के कारण सह्याद्रि पर्वतमाला भारत की अमूल्य प्राकृतिक धरोहर मानी जाती है।
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