BANGLES
चूड़ियाँ (Bangles)
चूड़ियाँ भारतीय संस्कृति और परंपरा का एक महत्वपूर्ण आभूषण हैं। इन्हें प्रायः कलाई में पहना जाता है और ये सौंदर्य, सौभाग्य तथा नारीत्व का प्रतीक मानी जाती हैं। भारत के विभिन्न राज्यों में चूड़ियों के अलग-अलग रूप, रंग और परंपराएँ देखने को मिलती हैं। विवाहित महिलाओं के लिए चूड़ियाँ पहनना शुभ माना जाता है और कई क्षेत्रों में यह सुहाग की निशानी होती हैं।
प्राचीन काल से ही चूड़ियों का प्रयोग होता आ रहा है। सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाइयों में भी चूड़ियों के अवशेष मिले हैं, जिससे इनके ऐतिहासिक महत्व का पता चलता है। पहले चूड़ियाँ मिट्टी, शंख, तांबे और कांच से बनाई जाती थीं, जबकि आजकल सोना, चांदी, लाख, प्लास्टिक, फाइबर और रत्नों से सजी आकर्षक चूड़ियाँ भी प्रचलन में हैं। बदलते समय के साथ इनके डिज़ाइन और शैली में भी काफी विविधता आई है।
चूड़ियों का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व भी है। त्योहारों, विवाह, करवा चौथ, तीज और अन्य मांगलिक अवसरों पर महिलाएँ विशेष रूप से चूड़ियाँ पहनती हैं। उत्तर भारत में लाल और हरी चूड़ियाँ लोकप्रिय हैं, वहीं राजस्थान की लाख की चूड़ियाँ और हैदराबाद की कांच की चूड़ियाँ प्रसिद्ध हैं। बंगाल में शंख और पोला चूड़ियाँ विवाह के बाद पहनने की परंपरा है।
आधुनिक समय में चूड़ियाँ फैशन का भी अहम हिस्सा बन गई हैं। आज महिलाएँ पारंपरिक परिधानों के साथ-साथ पश्चिमी कपड़ों पर भी स्टाइलिश चूड़ियाँ पहनती हैं। डिजाइनर चूड़ियाँ, कंगन और ब्रेसलेट्स युवाओं में खासे लोकप्रिय हैं। इस प्रकार चूड़ियाँ न केवल एक आभूषण हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और फैशन का सुंदर संगम भी हैं।
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