LOHAR
लोहार जाति – परिचय
लोहार जाति भारत की एक पारंपरिक व्यवसायिक और कारीगर समुदाय है। यह समाज मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में पाया जाता है। ऐतिहासिक रूप से लोहार समाज लोहा बनाने, हथियार निर्माण और लोहे के औजार तैयार करने के लिए प्रसिद्ध रहा है। लोहार शब्द “लोहा” से आया है, जिसका अर्थ है लोहे से संबंधित कार्य करने वाला।
परंपरागत रूप से लोहार समाज के लोग लोहे से कृषि उपकरण, हथियार, घरेलू उपकरण और अन्य लोहे के सामान बनाते थे। पुराने समय में यह समुदाय गांव और कस्बों में आवश्यक औजार और सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराने का काम करता था। लोहारों का काम केवल व्यवसाय तक सीमित नहीं था, बल्कि ग्रामीण जीवन और कृषि में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
सामाजिक संरचना की दृष्टि से लोहार समाज में परिवार और कुल परंपरा का विशेष महत्व है। विवाह सामाजिक और पारंपरिक नियमों के अनुसार संपन्न होते हैं। समाज में पंचायत या जातीय समिति सामाजिक नियमों के पालन और विवादों के समाधान में प्रभावशाली भूमिका निभाती है। लोहार समाज के लोकगीत, लोकनृत्य और त्योहार उनके जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। प्रमुख पर्वों में होली, दीपावली और छठ शामिल हैं।
भारत सरकार और राज्य सरकारों द्वारा लोहार जाति को कई राज्यों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अंतर्गत शामिल किया गया है। इससे शिक्षा, रोजगार और कल्याण योजनाओं में विशेष सुविधाएँ प्राप्त होती हैं।
कुल मिलाकर लोहार जाति एक मेहनती, कुशल और प्रगतिशील समाज है। परंपरा और आधुनिकता के संतुलन के साथ यह समाज भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि और व्यवसाय में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। लोहार समाज भारतीय संस्कृति और कारीगरी का प्रतीक माना जाता है।
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