KHO-KHO

 खो-खो खेल (Kho-Kho)

खो-खो भारत का एक प्राचीन और लोकप्रिय पारंपरिक खेल है, जो तेज़ी, फुर्ती, रणनीति और टीमवर्क पर आधारित है। यह खेल विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में लंबे समय से खेला जाता रहा है, लेकिन आज यह स्कूल, कॉलेज और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खेला जाता है। खो-खो को शारीरिक विकास के साथ-साथ मानसिक सतर्कता बढ़ाने वाला खेल माना जाता है।

खो-खो का खेल आयताकार मैदान में खेला जाता है। मैदान के बीच में एक सीधी रेखा खींची जाती है, जिस पर आठ खिलाड़ी एक दिशा में बैठते हैं और उनके बीच विपरीत दिशा में एक खंभा (पोल) लगा होता है। प्रत्येक टीम में कुल बारह खिलाड़ी होते हैं, जिनमें से नौ खिलाड़ी मैदान में उतरते हैं और तीन खिलाड़ी अतिरिक्त (रिज़र्व) होते हैं। खेल दो टीमों के बीच खेला जाता है, जिनमें से एक टीम ‘आक्रमणकारी’ (चेज़र) और दूसरी ‘रक्षक’ (डॉजर) होती है।

खेल का मुख्य उद्देश्य आक्रमणकारी टीम द्वारा रक्षक खिलाड़ियों को छूकर आउट करना होता है। आक्रमणकारी खिलाड़ी अपने साथी को ‘खो’ देकर दिशा बदल सकते हैं, जिससे खेल में गति और रणनीति बढ़ जाती है। रक्षक खिलाड़ी तेजी से दौड़ते हुए, दिशा बदलते हुए और चकमा देकर स्वयं को बचाने की कोशिश करते हैं। खेल का संचालन एक रेफरी और दो सहायक निर्णायकों द्वारा किया जाता है।

खो-खो खेलने से शरीर की सहनशक्ति, संतुलन, फुर्ती और एकाग्रता में वृद्धि होती है। यह खेल अनुशासन, सहयोग और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता भी विकसित करता है। कम संसाधनों में खेले जाने के कारण यह सभी वर्गों के लिए सुलभ है।

आज खो-खो का आधुनिक स्वरूप विकसित हो चुका है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ आयोजित होती हैं तथा भारत इस खेल में अग्रणी स्थान रखता है। खो-खो न केवल एक खेल है, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है।

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