SHANKARACHARYA AVIMUKTESHWARANAND

 शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी हिंदू धर्म के एक प्रमुख आध्यात्मिक गुरु, विद्वान संत और सनातन परंपरा के प्रतिष्ठित प्रतिनिधि हैं। वे उत्तराम्नाय ज्योतिर्मठ, बद्रीनाथ के शंकराचार्य हैं। अद्वैत वेदांत की परंपरा में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। वे जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित शंकराचार्य परंपरा के उत्तराधिकारी हैं और वेद, उपनिषद, गीता तथा धर्मशास्त्रों के गहन ज्ञाता हैं।

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी का जन्म एक धार्मिक परिवार में हुआ। बचपन से ही उनका झुकाव अध्यात्म, साधना और शास्त्र अध्ययन की ओर रहा। उन्होंने गुरु परंपरा के अंतर्गत वेदांत, संस्कृत व्याकरण, मीमांसा और दर्शन का विधिवत अध्ययन किया। कठोर तपस्या, ब्रह्मचर्य और संयमपूर्ण जीवन के कारण वे संत समाज में शीघ्र ही सम्मानित हुए।

वे सनातन धर्म की मूल मान्यताओं, गौ-रक्षा, वैदिक संस्कृति, सामाजिक नैतिकता और राष्ट्र के सांस्कृतिक मूल्यों के प्रबल समर्थक हैं। शंकराचार्य जी समय-समय पर सामाजिक और धार्मिक विषयों पर स्पष्ट एवं निर्भीक विचार रखते हैं। वे मानते हैं कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्य, अहिंसा, करुणा और कर्तव्यबोध का मार्ग है।

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी का प्रवचन सरल, तर्कपूर्ण और शास्त्रसम्मत होता है, जिससे सामान्य जन भी गूढ़ आध्यात्मिक विषयों को समझ पाते हैं। वे युवाओं को भारतीय संस्कृति से जोड़ने और नैतिक जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। उनके विचार समाज में धार्मिक चेतना, आत्ममंथन और सांस्कृतिक जागरण का कार्य करते हैं।

इस प्रकार शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी न केवल एक महान संत हैं, बल्कि सनातन धर्म की जीवंत परंपरा के सशक्त संवाहक भी हैं।

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