KUMHAR

 कुम्हार जाति – परिचय 

कुम्हार जाति भारत की एक पारंपरिक शिल्पकारी और व्यवसायिक समुदाय है। यह समाज मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और पश्चिम बंगाल में पाया जाता है। “कुम्हार” शब्द संस्कृत के “कुम्भ” (मिट्टी का बर्तन) से लिया गया है, जिसका अर्थ है—मिट्टी के बर्तन बनाने वाला। ऐतिहासिक रूप से कुम्हार समाज मिट्टी के बर्तन, दीपक, मूर्तियाँ और अन्य मिट्टी से बने घरेलू उपकरण बनाने के लिए प्रसिद्ध रहा है।

परंपरागत रूप से कुम्हार समाज के लोग मिट्टी के बर्तन, मिट्टी के दीपक और धार्मिक मूर्तियों का निर्माण करते हैं। पुराने समय में यह समाज ग्रामीण जीवन में आवश्यक बर्तनों और औजारों का उत्पादन करता था। इनके बर्तन खाना पकाने, पानी रखने और धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग किए जाते थे। कुम्हारों का कार्य केवल व्यवसाय तक सीमित नहीं था, बल्कि यह समाज भारतीय ग्रामीण संस्कृति और धार्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

सामाजिक दृष्टि से कुम्हार समाज में परिवार और कुल व्यवस्था का विशेष महत्व है। विवाह सामाजिक और पारंपरिक नियमों के अनुसार संपन्न होता है। समाज में पंचायत या जातीय समिति सामाजिक अनुशासन बनाए रखने और विवादों का समाधान करने में सहायक होती है। कुम्हार समाज के लोकगीत, लोकनृत्य और त्योहार उनके जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। दीपावली, होली और छठ इनके प्रमुख उत्सव हैं।

भारत सरकार और राज्य सरकारों द्वारा कुम्हार जाति को कई राज्यों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अंतर्गत शामिल किया गया है। इससे शिक्षा, रोजगार और कल्याण योजनाओं में विशेष लाभ प्राप्त होते हैं।

कुल मिलाकर कुम्हार जाति एक मेहनती, कलाप्रवीण और प्रगतिशील समाज है। परंपरा और आधुनिकता के संतुलन के साथ यह समाज भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था, शिल्पकला और संस्कृति में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

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