WAHEGURU JI KA KHALSA, WAHEGURU JI KI FATEH

 “वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फ़तेह” 

“वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फ़तेह” सिख धर्म का अत्यंत पवित्र और प्रेरणादायक जयघोष है। यह वाक्य सिखों की आस्था, साहस, समर्पण और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक माना जाता है। इस अभिवादन का प्रयोग सिख एक-दूसरे से मिलने पर, गुरुद्वारों में, धार्मिक आयोजनों में तथा ऐतिहासिक अवसरों पर करते हैं।

इस वाक्य के प्रत्येक शब्द का गहरा अर्थ है। “वाहेगुरु” का अर्थ है वह महान गुरु या परमात्मा, जो अज्ञान के अंधकार से ज्ञान की ओर ले जाने वाला है। “जी” सम्मान का सूचक है। “खालसा” का अर्थ है शुद्ध, पवित्र और ईश्वर को समर्पित समुदाय। “फ़तेह” का अर्थ है विजय। इस प्रकार पूरे वाक्य का भावार्थ है—खालसा वाहेगुरु का है और विजय भी वाहेगुरु की ही है।

इस जयघोष की परंपरा दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी से जुड़ी मानी जाती है। उन्होंने 1699 में खालसा पंथ की स्थापना कर सिखों को साहस, समानता और आत्मसम्मान का मार्ग दिखाया। “वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फ़तेह” कहकर सिख यह स्मरण करते हैं कि उनका जीवन और कर्म ईश्वर को समर्पित हैं और किसी भी सफलता का श्रेय स्वयं को नहीं, बल्कि वाहेगुरु को देना चाहिए।

यह वाक्य केवल धार्मिक नारा नहीं, बल्कि नैतिक शिक्षा भी देता है। यह अहंकार से दूर रहने, सत्य और न्याय के लिए खड़े होने तथा मानवता की सेवा करने की प्रेरणा देता है। युद्धकाल में भी यह जयघोष सिख योद्धाओं में निर्भयता और आत्मबल भरता था।

इस प्रकार “वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फ़तेह” सिख धर्म की आत्मा, अनुशासन और आध्यात्मिक दर्शन को संक्षेप में व्यक्त करने वाला महान संदेश है।

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