DIFFERENCE BETWEEN DM AND COLLECTOR
डीएम और कलेक्टर के बीच अंतर
भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में डीएम (District Magistrate) और कलेक्टर (Collector) दोनों ही अत्यंत महत्वपूर्ण पद हैं। आम जनता अक्सर इन दोनों पदों को एक ही समझ लेती है, क्योंकि कई राज्यों में एक ही अधिकारी दोनों भूमिकाएँ निभाता है। फिर भी, इन दोनों के कार्यक्षेत्र और जिम्मेदारियों में स्पष्ट अंतर मौजूद है।
1. डीएम (District Magistrate):
डीएम का मुख्य कार्य जिले में कानून-व्यवस्था बनाए रखना होता है। यह पद शासन के कार्यकारी शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। डीएम पुलिस प्रशासन से समन्वय कर शांति एवं सुरक्षा सुनिश्चित करता है। धारा 144 लागू करना, दंगा-नियंत्रण, आपदा प्रबंधन, चुनावों के दौरान व्यवस्था बनाए रखना आदि कार्य डीएम की जिम्मेदारी में आते हैं। डीएम को दंडाधिकारी powers प्राप्त होती हैं, इसलिए उसे जिलाधिकारी भी कहा जाता है। कानून व्यवस्था और लोक सुरक्षा से जुड़े सभी मामलों में अंतिम प्रशासनिक निर्णय लेने का अधिकार डीएम के पास होता है।
2. कलेक्टर (Collector):
कलेक्टर का कार्य मुख्य रूप से राजस्व प्रशासन से जुड़ा होता है। इस पद की स्थापना ब्रिटिश काल में राजस्व वसूली के लिए हुई थी। कलेक्टर भूमि राजस्व, भू-अभिलेख, भूमि अधिग्रहण, स्टाम्प ड्यूटी और अन्य सरकारी करों की वसूली का प्रभारी होता है। इसके अलावा, कलेक्टर किसानों से जुड़े भूमि विवादों के निपटारे, प्राकृतिक आपदा मुआवज़ा वितरण और सरकारी योजनाओं की निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
मुख्य अंतर:
जहाँ डीएम जिले की कानून-व्यवस्था संभालता है, वहीं कलेक्टर राजस्व प्रबंधन का प्रमुख अधिकारी होता है। डीएम पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के साथ अधिक काम करता है, जबकि कलेक्टर राजस्व विभाग, तहसीलों और भूमि अभिलेख विभाग से जुड़ा होता है।
हालाँकि वास्तविक जीवन में एक ही आईएएस अधिकारी दोनों भूमिकाएँ निभाता है, लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से दोनों पदों की जिम्मेदारियाँ अलग-अलग हैं। दोनों मिलकर जिला प्रशासन को सुचारु रूप से चलाते हैं और जनता को सेवाएँ प्रदान करते हैं।
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