BARDO CHIHAM

 बार्डो चिहाम (Bardo Chiham) तिब्बती बौद्ध दर्शन का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। “बार्डो” शब्द का अर्थ है मध्य अवस्था और “चिहाम” का अर्थ चेतना की यात्रा से जुड़ा माना जाता है। यह अवधारणा विशेष रूप से मृत्यु, पुनर्जन्म और आत्मा की चेतन अवस्थाओं को समझने में सहायक है। तिब्बती बौद्ध परंपरा में माना जाता है कि मृत्यु के बाद आत्मा तुरंत पुनर्जन्म नहीं लेती, बल्कि वह एक विशेष मध्य अवस्था से होकर गुजरती है, जिसे बार्डो कहा जाता है।

बार्डो चिहाम के अनुसार, मनुष्य का जीवन केवल जन्म और मृत्यु तक सीमित नहीं है, बल्कि चेतना निरंतर परिवर्तनशील अवस्था में रहती है। इस दर्शन में बताया गया है कि मृत्यु के बाद आत्मा को अपने कर्मों का साक्षात्कार होता है। अच्छे कर्म आत्मा को शांति और मुक्ति की ओर ले जाते हैं, जबकि बुरे कर्म भय और भ्रम उत्पन्न करते हैं। इसी कारण बौद्ध धर्म में जीवन के दौरान सही आचरण, करुणा और ध्यान पर विशेष बल दिया गया है।

तिब्बती बौद्ध ग्रंथों में बार्डो चिहाम का विस्तृत वर्णन मिलता है, विशेषकर बार्डो थोदोल (जिसे पश्चिम में “तिब्बती मृत्युग्रंथ” कहा जाता है) में। इसमें मृत्यु के समय और उसके बाद आत्मा को मार्गदर्शन देने के लिए मंत्र, प्रार्थनाएँ और ध्यान विधियाँ बताई गई हैं। इनका उद्देश्य आत्मा को भ्रम से निकालकर सही मार्ग पर ले जाना है, ताकि वह मोक्ष या उत्तम पुनर्जन्म प्राप्त कर सके।

बार्डो चिहाम केवल मृत्यु से संबंधित अवधारणा नहीं है, बल्कि यह जीवन को भी सार्थक ढंग से जीने की प्रेरणा देता है। यह सिखाता है कि प्रत्येक क्षण एक मध्य अवस्था है, जहाँ मनुष्य अपने कर्मों और विचारों के माध्यम से भविष्य का निर्माण करता है। इस प्रकार बार्डो चिहाम तिब्बती बौद्ध दर्शन में जीवन, मृत्यु और आत्मिक चेतना को जोड़ने वाली एक गहन और आध्यात्मिक अवधारणा है।

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