UTTARAYAN
उत्तरायण
उत्तरायण भारतीय संस्कृति और खगोल विज्ञान से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण काल है। जब सूर्य अपनी गति बदलते हुए दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर बढ़ने लगता है, तब इस अवधि को उत्तरायण कहा जाता है। यह समय सामान्यतः मकर संक्रांति से आरंभ होता है, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। उत्तरायण को शुभ और कल्याणकारी माना गया है तथा इसका धार्मिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक महत्व है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उत्तरायण देवताओं का दिन माना जाता है। महाभारत में वर्णित भीष्म पितामह ने उत्तरायण काल की प्रतीक्षा कर अपने प्राण त्यागे थे, जिससे इस समय की पवित्रता और महत्ता का उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि उत्तरायण में किया गया दान, जप, तप और पुण्य कर्म विशेष फल प्रदान करता है। इस अवधि में तीर्थ स्नान, यज्ञ और पूजा-पाठ का विशेष महत्व होता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से उत्तरायण पृथ्वी की सूर्य के सापेक्ष स्थिति में परिवर्तन का परिणाम है। इस दौरान सूर्य की किरणें धीरे-धीरे उत्तरी गोलार्ध पर अधिक सीधी पड़ने लगती हैं, जिससे दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं। इसी कारण मौसम में परिवर्तन आता है और शीत ऋतु के प्रभाव में कमी होने लगती है। यह काल प्रकृति में नई ऊर्जा और जीवन का संचार करता है।
सांस्कृतिक रूप से उत्तरायण उत्सव और आनंद का प्रतीक है। गुजरात और राजस्थान में इसे उत्तरायण पर्व के रूप में बड़े उत्साह से मनाया जाता है, जहाँ पतंग उड़ाने की परंपरा अत्यंत लोकप्रिय है। रंग-बिरंगी पतंगों से आकाश भर जाता है और समाज में उल्लास का वातावरण बनता है। घरों में तिल, गुड़ और मूंगफली से बने व्यंजन तैयार किए जाते हैं।
कृषि के दृष्टिकोण से भी उत्तरायण का महत्व है। यह समय रबी फसलों के विकास का होता है और किसान अच्छी पैदावार की आशा करते हैं। इस प्रकार उत्तरायण धार्मिक, वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और कृषि सभी दृष्टियों से महत्वपूर्ण काल है, जो सकारात्मकता, प्रकाश और प्रगति का संदेश देता है।
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