THIRUVADHIRA

 थिरुवाधिरा (Thiruvathira / Thiruvadhira)

थिरुवाधिरा केरल का एक प्रमुख पारंपरिक लोक नृत्य है, जिसे मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। यह नृत्य थिरुवाधिरा पर्व के अवसर पर किया जाता है, जो मलयालम पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष (धनु) मास में आता है। थिरुवाधिरा का संबंध भगवान शिव से माना जाता है और इसे उनके आनंद तांडव का प्रतीक कहा जाता है। इस नृत्य के माध्यम से महिलाएँ वैवाहिक सुख, दीर्घायु और पारिवारिक समृद्धि की कामना करती हैं।

थिरुवाधिरा नृत्य प्रायः मंदिर प्रांगण या घर के आंगन में गोल घेरा बनाकर किया जाता है। महिलाएँ हाथों में हाथ डालकर या लयबद्ध ढंग से कदम बढ़ाते हुए नृत्य करती हैं। इसकी गतियाँ कोमल, सौम्य और तालबद्ध होती हैं, जिनमें शरीर का संतुलित संचालन और भावपूर्ण मुद्राएँ प्रमुख होती हैं। नृत्य के दौरान समूह सामंजस्य और लय पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

इस नृत्य के साथ पारंपरिक थिरुवाधिरा पाट्टु गाए जाते हैं। ये गीत भगवान शिव, पार्वती और पौराणिक कथाओं पर आधारित होते हैं। संगीत सामान्यतः बिना वाद्ययंत्रों के या बहुत हल्के ताल वाद्यों के साथ गाया जाता है, जिससे गीतों की भावनात्मक गहराई उभरकर सामने आती है।

थिरुवाधिरा की वेशभूषा अत्यंत सादगीपूर्ण और सुंदर होती है। महिलाएँ केरल की पारंपरिक कसावु साड़ी पहनती हैं, बालों में फूल लगाती हैं और हल्के आभूषण धारण करती हैं। यह सादगी नृत्य की आध्यात्मिक भावना को और अधिक प्रभावशाली बनाती है।

सांस्कृतिक दृष्टि से थिरुवाधिरा नृत्य केरल की नारी परंपरा, भक्ति और सामूहिकता का प्रतीक है। यह नृत्य आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ जीवित है।

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