KAAVADI DANCE
कावड़ी नृत्य (Kaavadi Dance)
कावड़ी नृत्य दक्षिण भारत, विशेष रूप से तमिलनाडु का एक प्रसिद्ध धार्मिक और अनुष्ठानिक नृत्य है, जो भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) की भक्ति से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह नृत्य कावड़ी अट्टम के नाम से भी जाना जाता है। कावड़ी शब्द का अर्थ है—भार या बोझ, जिसे भक्त अपनी आस्था और तपस्या के प्रतीक के रूप में धारण करते हैं। यह नृत्य मुख्यतः थाइपूसम और अन्य मुरुगन उत्सवों के अवसर पर किया जाता है।
कावड़ी नृत्य में भक्त अपने कंधों पर सजी हुई कावड़ी उठाकर नृत्य करते हैं। कावड़ी लकड़ी या धातु से बनी होती है और इसे फूलों, पंखों, रंगीन कपड़ों तथा मयूर पंखों से सजाया जाता है। कुछ भक्त कठोर व्रत, उपवास और संयम का पालन करते हुए इस नृत्य को करते हैं, जिससे उनकी भक्ति और आत्म-नियंत्रण का परिचय मिलता है।
नृत्य की गतियाँ लयबद्ध, घूमती हुई और भावपूर्ण होती हैं। नर्तक भक्ति में लीन होकर संगीत की ताल पर आगे-पीछे, गोल-गोल घूमते हुए नृत्य करते हैं। इस दौरान वे अक्सर ध्यानावस्था में प्रतीत होते हैं। कावड़ी नृत्य के साथ पारंपरिक तमिल वाद्ययंत्र जैसे नादस्वरम्, थविल, ढोल और झांझ बजाए जाते हैं, जो वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देते हैं।
वेशभूषा साधारण लेकिन प्रतीकात्मक होती है। भक्त पीले या केसरिया वस्त्र पहनते हैं, माथे पर भस्म या तिलक लगाते हैं और शरीर पर भक्ति चिह्न अंकित करते हैं।
कावड़ी नृत्य केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि भक्ति, तपस्या और समर्पण की जीवंत अभिव्यक्ति है। यह तमिल संस्कृति और शैव-भक्ति परंपरा का महत्वपूर्ण अंग है, जो आज भी श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाया जाता है।
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