MAKAR SANKRANTI
मकर संक्रांति
मकर संक्रांति भारत का एक प्रमुख और प्राचीन पर्व है, जिसे सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। यह पर्व सामान्यतः 14 या 15 जनवरी को आता है और सौर पंचांग पर आधारित होने के कारण हर वर्ष लगभग एक ही तिथि पर मनाया जाता है। मकर संक्रांति के साथ ही सूर्य की उत्तरायण गति आरंभ होती है, जिसे भारतीय परंपरा में शुभ माना गया है।
धार्मिक दृष्टि से मकर संक्रांति का विशेष महत्व है। इस दिन गंगा, यमुना, गोदावरी जैसी पवित्र नदियों में स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति मानी जाती है। उत्तर प्रदेश में प्रयागराज के संगम पर, पश्चिम बंगाल में गंगासागर तथा अन्य तीर्थ स्थलों पर विशाल मेले और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। दान-पुण्य का भी इस दिन विशेष महत्व है, विशेषकर तिल, गुड़, खिचड़ी और वस्त्रों का दान किया जाता है।
मकर संक्रांति कृषि से जुड़ा हुआ पर्व भी है। यह फसल कटाई के समय मनाया जाता है, इसलिए किसानों के लिए यह उत्सव और कृतज्ञता का अवसर होता है। विभिन्न राज्यों में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। तमिलनाडु में यह पोंगल, असम में भोगाली बिहू, पंजाब में लोहड़ी और गुजरात व राजस्थान में उत्तरायण के रूप में मनाया जाता है।
इस पर्व की एक प्रमुख विशेषता पतंग उड़ाना है, विशेषकर गुजरात, राजस्थान और उत्तर भारत के कई हिस्सों में। रंग-बिरंगी पतंगों से आकाश भर जाता है और वातावरण उल्लासपूर्ण हो जाता है। घरों में तिल-गुड़ से बने लड्डू, चिक्की और अन्य पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं, जो आपसी मेल-जोल और मधुर संबंधों का प्रतीक हैं।
सांस्कृतिक रूप से मकर संक्रांति सामाजिक एकता और सद्भाव का संदेश देती है। यह पर्व प्रकृति, सूर्य और कृषि के प्रति सम्मान प्रकट करता है। इस प्रकार मकर संक्रांति न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जो नई ऊर्जा और सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
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