KATHAKALI

 कथकली नृत्य (Kathakali Dance)

कथकली नृत्य भारत के केरल राज्य का एक प्रमुख और प्राचीन शास्त्रीय नृत्य-नाट्य रूप है। इसका नाम “कथा” और “कली” से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है—कथा का खेल। कथकली नृत्य मुख्य रूप से हिन्दू पौराणिक कथाओं, महाभारत, रामायण और पुराणों पर आधारित होता है। यह नृत्य न केवल अभिनय बल्कि संगीत, शारीरिक मुद्राएँ और रंग-बिरंगी वेशभूषा का अद्भुत मिश्रण है।

कथकली का मंचन प्रायः रात भर चलता है। इस नृत्य में पुरुष कलाकार ही मुख्य रूप से भाग लेते हैं, जो विभिन्न पात्रों का रूप धारण करते हैं। नृत्य में शारीरिक मुद्राओं का विशेष महत्व होता है। आँखों की भावभंगिमा, हाथों की मुद्राएँ (हस्तमुद्राएँ) और चेहरे के हाव-भाव कथा को जीवंत बनाते हैं। कथकली में संवाद कम होते हैं और मुख्यतः कथावाचन संगीत और ताल के माध्यम से होता है।

कथकली नृत्य की वेशभूषा अत्यंत भव्य और आकर्षक होती है। कलाकार सिर पर भारी मुकुट, रंग-बिरंगा मुखौटा, विस्तृत परिधान और पारंपरिक आभूषण पहनते हैं। मुखौटा और मेकअप पात्र की प्रकृति को दर्शाते हैं—हरी त्वचा वाले पात्र देवता या नायक होते हैं, लाल या काली त्वचा वाले राक्षस और दुष्ट पात्र।

कथकली में संगीत का विशेष महत्व है। शास्त्रीय केरल संगीत और ढोल, मृदंगम, चेंदा वाद्ययंत्रों का उपयोग किया जाता है। गीतों में नायक और राक्षस के संघर्ष, वीरता और भावनाएँ प्रमुख रूप से व्यक्त होती हैं।

सांस्कृतिक दृष्टि से कथकली नृत्य केरल की कला और परंपरा का प्रतीक है। यह न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि लोक जीवन, धार्मिक विश्वास और भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा को जीवंत रखने का माध्यम भी है। आज कथकली विश्वभर में अपनी अनूठी शैली और भव्य प्रस्तुति के लिए प्रसिद्ध है।

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