CHAMRI DANCE

 चामरी (Chamri) नृत्य हिमाचल प्रदेश के लाहौल–स्पीति क्षेत्र का एक प्रमुख पारंपरिक लोकनृत्य है। यह नृत्य विशेष रूप से बौद्ध समुदाय से जुड़ा हुआ है और स्थानीय लोगों के सामाजिक-धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। चामरी नृत्य का नाम “चामर” या याक की पूँछ से बने पारंपरिक चामर से जुड़ा माना जाता है, जिसका उपयोग नृत्य के दौरान किया जाता है।

चामरी नृत्य प्रायः बौद्ध पर्वों, मठ उत्सवों और धार्मिक आयोजनों के अवसर पर प्रस्तुत किया जाता है। यह नृत्य शांति, करुणा और आध्यात्मिक चेतना को दर्शाता है। नर्तक समूह में वृत्ताकार या पंक्तिबद्ध होकर नृत्य करते हैं। उनकी गतियाँ सौम्य, नियंत्रित और लयात्मक होती हैं, जो मन में स्थिरता और ध्यान की भावना उत्पन्न करती हैं। इस नृत्य में तेज उछाल या आक्रामक कदमों की जगह शांत और प्रवाहपूर्ण चाल को महत्व दिया जाता है।

इस नृत्य के साथ प्रयुक्त संगीत और वाद्ययंत्र बौद्ध परंपरा से जुड़े होते हैं। ढोल, नगाड़ा, झांझ, शंख और लंबी तुरही जैसे वाद्ययंत्रों की गंभीर ध्वनि वातावरण को आध्यात्मिक बना देती है। कई बार मंत्रोच्चार और धार्मिक धुनें भी संगीत का हिस्सा होती हैं, जिससे नृत्य का प्रभाव और गहरा हो जाता है।

पारंपरिक वेशभूषा चामरी नृत्य की विशेष पहचान है। नर्तक रंगीन ऊनी वस्त्र, लंबे चोगे, टोपी और हाथों में चामर धारण करते हैं। ठंडे पर्वतीय वातावरण के अनुरूप परिधान न केवल सुंदर होते हैं, बल्कि व्यावहारिक भी होते हैं। परिधानों पर बने पारंपरिक बौद्ध प्रतीक और रंग स्थानीय संस्कृति को दर्शाते हैं।

समग्र रूप से, चामरी नृत्य लाहौल–स्पीति की सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक आस्था और सामुदायिक एकता का सजीव प्रतीक है। यह नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शांति और परंपराओं के संरक्षण का भी महत्वपूर्ण माध्यम है।

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