SAMAA
समा (Samaa / Sama)
समा सूफ़ी परंपरा से जुड़ी एक आध्यात्मिक साधना और संगीतात्मक विधा है, जिसका उद्देश्य आत्मा को ईश्वर की निकटता का अनुभव कराना है। “समा” अरबी शब्द है, जिसका अर्थ है—सुनना। सूफ़ी मत में माना जाता है कि पवित्र संगीत, क़व्वाली और काव्य के माध्यम से ईश्वर के प्रेम को “सुना” और महसूस किया जा सकता है। समा केवल संगीत नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभूति है, जिसमें साधक अपने अहंकार से ऊपर उठकर परम सत्य से जुड़ने का प्रयास करता है।
समा की परंपरा इस्लामी रहस्यवाद यानी सूफ़ीवाद में विकसित हुई। विभिन्न सूफ़ी सिलसिलों में समा की प्रस्तुति अलग-अलग रूपों में होती है। भारत में चिश्ती सिलसिले ने समा को विशेष महत्व दिया, जहाँ क़व्वाली के माध्यम से ईश्वर प्रेम, भक्ति और मानवता का संदेश दिया जाता है। अमीर ख़ुसरो जैसे सूफ़ी संतों ने समा को भारतीय संगीत और भाषा से जोड़कर इसे और अधिक लोकप्रिय बनाया।
समा की सभा को “महफ़िल-ए-समा” कहा जाता है। इसमें क़व्वाल या गायक सूफ़ी कविताएँ, हम्द, नात और क़व्वालियाँ प्रस्तुत करते हैं। ढोलक, तबला, हारमोनियम और कभी-कभी रबाब जैसे वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता है। संगीत की लय और शब्दों की गहराई श्रोताओं को भावविभोर कर देती है। कई बार साधक ध्यानावस्था या आध्यात्मिक उन्माद की स्थिति में पहुँच जाते हैं, जिसे “वज्द” कहा जाता है।
समा का उद्देश्य मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि और ईश्वर प्रेम की अनुभूति है। यह जाति, धर्म और भाषा की सीमाओं से ऊपर उठकर मानवता और प्रेम का संदेश देता है। आज भी समा सूफ़ी दरगाहों और सांस्कृतिक मंचों पर श्रद्धा और सम्मान के साथ प्रस्तुत किया जाता है।
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