CHALO FOLK

 चालो लोक नृत्य (Chalo Folk Dance)

चालो लोक नृत्य भारत के केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख का एक प्रसिद्ध पारंपरिक लोक नृत्य है। यह नृत्य मुख्य रूप से लद्दाख के दार्द (ब्रोखपा) समुदाय से जुड़ा हुआ माना जाता है। चालो नृत्य वहाँ के ग्रामीण जीवन, प्रकृति के प्रति आस्था और सामुदायिक एकता को सुंदर रूप में अभिव्यक्त करता है। यह नृत्य विशेष अवसरों जैसे फसल कटाई, धार्मिक त्योहारों और सामाजिक उत्सवों पर किया जाता है।

चालो नृत्य प्रायः सामूहिक रूप से खुले मैदान या गाँव के प्रांगण में प्रस्तुत किया जाता है। इसमें पुरुष और महिलाएँ एक साथ पंक्तिबद्ध होकर या वृत्ताकार रूप में नृत्य करते हैं। नृत्य की गतियाँ सरल, लयबद्ध और सौम्य होती हैं, जिनमें तालमेल और अनुशासन स्पष्ट दिखाई देता है। हाथों की मुद्राएँ, पैरों की गति और शरीर का संतुलित संचालन इस नृत्य की विशेष पहचान है।

चालो नृत्य की वेशभूषा लद्दाखी संस्कृति को दर्शाती है। पुरुष ऊनी वस्त्र, टोपी और कमरबंद पहनते हैं, जबकि महिलाएँ पारंपरिक गोनचा, रंगीन पट्टियाँ और आभूषण धारण करती हैं। ठंडे पर्वतीय क्षेत्र के अनुरूप ये वस्त्र न केवल सुंदर होते हैं, बल्कि उपयोगी भी होते हैं।

इस नृत्य के साथ पारंपरिक लोक संगीत गाया और बजाया जाता है। ढोल, दमामन और स्थानीय वाद्ययंत्रों की धीमी किंतु मधुर ताल नृत्य को भावनात्मक गहराई प्रदान करती है। गीतों में प्रकृति, जीवन, प्रेम और देवताओं की स्तुति का वर्णन मिलता है।

सांस्कृतिक दृष्टि से चालो लोक नृत्य लद्दाख की पहचान का महत्वपूर्ण अंग है। यह नृत्य नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ता है और सामूहिक सहयोग व सामाजिक सौहार्द का संदेश देता है। आज भी चालो नृत्य लद्दाखी लोक संस्कृति की जीवंत धरोहर के रूप में संरक्षित है।

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