LOVE STORY OF USHA AND ANIRUDH
उषा और अनिरुद्ध की प्रेम कथा
उषा और अनिरुद्ध की प्रेम कथा भारतीय पौराणिक साहित्य की एक अत्यंत प्रसिद्ध और भावनात्मक कथा है। यह कथा मुख्य रूप से भागवत पुराण और अन्य पुराणों में वर्णित है तथा असुर राजा बाणासुर, भगवान शिव और भगवान कृष्ण से गहराई से जुड़ी हुई है। प्रेम, साहस, भक्ति और संघर्ष का सुंदर संगम इस कथा को विशेष बनाता है।
बाणासुर एक शक्तिशाली असुर राजा था और भगवान शिव का परम भक्त माना जाता था। उसकी राजधानी प्राग्ज्योतिषपुर (वर्तमान तेजपुर, असम) थी। बाणासुर की पुत्री उषा अत्यंत सुंदर, सुसंस्कृत और कलाप्रेमी राजकुमारी थी। एक दिन उषा ने स्वप्न में एक अत्यंत सुंदर युवक को देखा और उससे प्रेम कर बैठी। स्वप्न टूटने के बाद वह युवक के विचारों में डूबी रहने लगी और उदास रहने लगी।
उषा की सखी चित्रलेखा एक दिव्य शक्तियों से युक्त कलाकार थी। उसने उषा की उदासी का कारण पूछा और स्वप्न में देखे गए युवक का चित्र बनाकर पहचानने का प्रयास किया। चित्रलेखा ने देवताओं, गंधर्वों, यक्षों और राजकुमारों के अनेक चित्र बनाए। जब उषा ने भगवान कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का चित्र देखा, तो वह तुरंत पहचान गई और बोली कि यही वही युवक है जिससे उसने स्वप्न में प्रेम किया था।
चित्रलेखा अपनी योग और मायावी शक्तियों से अनिरुद्ध को द्वारका से उठाकर प्राग्ज्योतिषपुर ले आई। अनिरुद्ध और उषा का मिलन हुआ और दोनों एक-दूसरे से प्रेम करने लगे। वे गुप्त रूप से एक साथ रहने लगे, किंतु यह बात अधिक समय तक छिपी न रह सकी।
जब बाणासुर को इस गुप्त प्रेम संबंध का पता चला, तो वह क्रोधित हो उठा। उसने अनिरुद्ध को बंदी बना लिया और कारागार में डाल दिया। उषा अपने प्रेमी की इस दशा से अत्यंत दुखी हुई, किंतु पिता के भय से कुछ न कर सकी। इधर द्वारका में अनिरुद्ध के लापता होने से कृष्ण और बलराम चिंतित हो गए।
जब कृष्ण को सम्पूर्ण घटना का ज्ञान हुआ, तो वे अपनी विशाल सेना के साथ प्राग्ज्योतिषपुर पहुँचे। बाणासुर और कृष्ण के बीच भयंकर युद्ध हुआ। बाणासुर को भगवान शिव का संरक्षण प्राप्त था, जिससे युद्ध और भी कठिन हो गया। अंततः भगवान कृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति से बाणासुर की हजार भुजाएँ काट दीं। तब भगवान शिव ने प्रकट होकर बाणासुर की प्राणरक्षा की प्रार्थना की। शिव की विनती स्वीकार कर कृष्ण ने बाणासुर को जीवनदान दिया।
युद्ध के बाद अनिरुद्ध को मुक्त किया गया और बाणासुर ने अपनी भूल स्वीकार करते हुए उषा और अनिरुद्ध का विधिपूर्वक विवाह कर दिया। इस प्रकार प्रेम, साहस और धर्म की विजय हुई।
उषा और अनिरुद्ध की यह प्रेम कथा त्याग, विश्वास और संघर्ष के बाद प्राप्त प्रेम का प्रतीक है। यह कथा आज भी भारतीय संस्कृति में प्रेम और धैर्य का प्रेरणास्रोत मानी जाती है।
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