DAHI CHURA TILKUT
दही–चूड़ा–तिलकुट
दही–चूड़ा–तिलकुट बिहार और पूर्वी भारत की एक विशिष्ट एवं लोकप्रिय पारंपरिक खाद्य परंपरा है, जिसका विशेष संबंध मकर संक्रांति पर्व से है। यह संयोजन केवल भोजन नहीं, बल्कि ग्रामीण संस्कृति, सामाजिक सौहार्द और सादगी का प्रतीक माना जाता है। मकर संक्रांति के अवसर पर बिहार के लगभग हर घर में दही–चूड़ा–तिलकुट अवश्य बनाया और खाया जाता है।
चूड़ा, धान से तैयार किया गया पतला चपटा चावल होता है, जिसे हल्का और पौष्टिक माना जाता है। इसमें ताज़ा दही मिलाने से इसका स्वाद और पोषण दोनों बढ़ जाते हैं। दही शरीर को ठंडक प्रदान करता है और पाचन में सहायक होता है, जबकि चूड़ा ऊर्जा देने वाला आहार है। सर्दियों के मौसम में यह संयोजन स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी माना जाता है।
तिलकुट तिल और गुड़ या चीनी से बना एक पारंपरिक मिठाई है। तिल में भरपूर मात्रा में कैल्शियम, आयरन और स्वस्थ वसा पाई जाती है, जो सर्दी के मौसम में शरीर को गर्मी और शक्ति प्रदान करती है। तिलकुट न केवल स्वादिष्ट होता है, बल्कि आयुर्वेदिक दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी माना जाता है। गया, नालंदा और पटना के तिलकुट विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
दही–चूड़ा–तिलकुट का सामाजिक महत्व भी बहुत अधिक है। मकर संक्रांति के दिन लोग एक-दूसरे के घर जाकर यह प्रसाद ग्रहण करते हैं और आपसी मेल-मिलाप बढ़ाते हैं। यह परंपरा भाईचारे, समानता और सरल जीवनशैली का संदेश देती है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह भोजन अतिथि सत्कार का प्रतीक भी माना जाता है।
इस प्रकार दही–चूड़ा–तिलकुट केवल एक पारंपरिक भोजन नहीं, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक पहचान है। यह परंपरा प्रकृति, मौसम और मानव स्वास्थ्य के बीच संतुलन को दर्शाती है और पीढ़ियों से चली आ रही लोकसंस्कृति को जीवंत बनाए रखती है।
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