PONGAL DANCE
पोंगल नृत्य (Pongal Dance)
पोंगल नृत्य तमिलनाडु का एक प्रमुख लोक नृत्य है, जो मुख्यतः पोंगल पर्व के अवसर पर किया जाता है। पोंगल दक्षिण भारत का सबसे महत्वपूर्ण कृषि पर्व है, जिसे फसल कटाई के बाद सूर्य देवता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए मनाया जाता है। इस उत्सव में नृत्य, संगीत, रंगोली और सामूहिक उल्लास की विशेष भूमिका होती है। पोंगल नृत्य किसानों के जीवन, उनकी मेहनत और प्रकृति के साथ उनके गहरे संबंध को दर्शाता है।
यह नृत्य प्रायः खुले मैदानों, गाँव के प्रांगणों या मंदिर परिसरों में सामूहिक रूप से किया जाता है। पुरुष और महिलाएँ पारंपरिक वेशभूषा धारण करते हैं—महिलाएँ रंग-बिरंगी साड़ियाँ और पुरुष धोती व अंगवस्त्र पहनते हैं। नर्तक अपने हाथों में मटका, धान की बालियाँ या अन्य कृषि प्रतीक लेकर लयबद्ध गतियों के साथ नृत्य करते हैं। इन प्रतीकों के माध्यम से समृद्धि, उर्वरता और अच्छे उत्पादन की कामना व्यक्त की जाती है।
पोंगल नृत्य के साथ पारंपरिक तमिल लोक संगीत बजाया जाता है, जिसमें नादस्वरम्, थविल और ढोल जैसे वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता है। संगीत की ताल सरल किंतु उत्साहपूर्ण होती है, जो दर्शकों को भी नृत्य में शामिल होने के लिए प्रेरित करती है। नृत्य की मुद्राएँ सरल, स्वाभाविक और ऊर्जा से भरपूर होती हैं, जो खेतों में काम करते किसानों की गतिविधियों से प्रेरित मानी जाती हैं।
सांस्कृतिक दृष्टि से पोंगल नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता और परंपराओं के संरक्षण का माध्यम भी है। यह नृत्य नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ता है और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश देता है। आज भी पोंगल नृत्य तमिल समाज की जीवंत लोक परंपरा के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है।
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