DANDI BRAHMAN

 दंडी ब्राह्मण हिंदू धर्म की एक प्राचीन और विशिष्ट संन्यासी परंपरा से जुड़े हुए माने जाते हैं। “दंडी” शब्द का अर्थ है दंड (छड़ी) धारण करने वाला। यह दंड त्याग, अनुशासन, संयम और आत्मसंयम का प्रतीक होता है। दंडी ब्राह्मण मुख्यतः शंकराचार्य द्वारा स्थापित अद्वैत वेदांत परंपरा से संबद्ध संन्यासी होते हैं, जो एक या अनेक दंड धारण करते हैं।

दंडी ब्राह्मण सामान्यतः ब्रह्मचारी जीवन का पालन करते हैं और सांसारिक भोग-विलास से दूर रहते हैं। उनका जीवन वेदों, उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता के अध्ययन, ध्यान और साधना में व्यतीत होता है। वे समाज को ज्ञान, वैराग्य और धर्म का संदेश देते हैं। दंडी संन्यासी प्रायः केसरिया वस्त्र धारण करते हैं और हाथ में दंड रखते हैं, जो उनके संकल्प और तपस्या का प्रतीक होता है।

दंडी ब्राह्मणों के दो प्रमुख प्रकार माने जाते हैं—एकदंडी और त्रिदंडी। एकदंडी संन्यासी एक ही दंड धारण करते हैं और अद्वैत वेदांत की परंपरा से जुड़े होते हैं। वहीं त्रिदंडी संन्यासी तीन दंड रखते हैं, जो मन, वचन और कर्म की शुद्धता का प्रतीक माने जाते हैं। दोनों ही परंपराओं का उद्देश्य आत्मज्ञान की प्राप्ति और मोक्ष की ओर अग्रसर होना है।

इतिहास में दंडी ब्राह्मणों ने भारतीय दर्शन और शिक्षा के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शंकराचार्य के मठों—श्रृंगेरी, द्वारका, पुरी और ज्योतिर्मठ—में दंडी संन्यासियों की परंपरा आज भी जीवित है। ये संन्यासी समाज को सत्य, अहिंसा और आत्मसंयम का मार्ग दिखाते हैं।

इस प्रकार दंडी ब्राह्मण भारतीय सनातन परंपरा में त्याग, तपस्या और ज्ञान के प्रतीक माने जाते हैं, जिनका जीवन आध्यात्मिक साधना और लोककल्याण को समर्पित होता है।

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