NATA SANKIRTANA
नाटा संकीर्तन मणिपुर की एक अत्यंत प्राचीन, पवित्र और समृद्ध वैष्णव परंपरा से जुड़ी सांस्कृतिक कला है। यह केवल एक संगीत या नृत्य रूप नहीं, बल्कि भक्ति, साधना और सामूहिक आध्यात्मिक अनुभव का माध्यम है। नाटा संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य भगवान श्रीकृष्ण और राधा के जीवन, लीलाओं और भक्ति भाव को संगीत, नृत्य और वाद्ययंत्रों के माध्यम से प्रस्तुत करना है।
नाटा संकीर्तन की प्रस्तुति में गायन (ईशेई), नृत्य, और वाद्य संगीत का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। इसमें प्रमुख रूप से पुंग (ढोल), कर्टल (झांझ) और मोइबुंग (शंख) का प्रयोग किया जाता है। कलाकार पारंपरिक वस्त्र पहनकर एक वृत्ताकार रूप में बैठते या खड़े होते हैं और भक्ति गीतों के साथ लयबद्ध नृत्य करते हैं। पुंग वादन और शरीर की गतियों का तालमेल इस कला को अत्यंत प्रभावशाली बनाता है।
नाटा संकीर्तन मणिपुर के सामाजिक और धार्मिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है। यह कला मंदिरों, उत्सवों, विवाह संस्कारों और धार्मिक आयोजनों में अनिवार्य रूप से प्रस्तुत की जाती है। इसके माध्यम से न केवल ईश्वर की आराधना की जाती है, बल्कि समाज में अनुशासन, एकता और सांस्कृतिक मूल्यों को भी सुदृढ़ किया जाता है। यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से आगे बढ़ती रही है।
नाटा संकीर्तन के सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए यूनेस्को ने वर्ष 2013 में इसे मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर (Intangible Cultural Heritage of Humanity) के रूप में मान्यता दी। यह मान्यता मणिपुर की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने में सहायक बनी।
संक्षेप में, नाटा संकीर्तन केवल एक कला नहीं, बल्कि भक्ति, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का जीवंत प्रतीक है, जो मणिपुर की पहचान को भारत और विश्व के सांस्कृतिक मानचित्र पर गौरवपूर्ण स्थान प्रदान करता है।
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