HARI MADHAB MUKHOPADHYAY

 

 पद्मश्री हरी माधब मुखोपाध्याय (Hari Madhab Mukhopadhyay)
हरी माधब मुखोपाध्याय को पद्मश्री 2026 के लिए मरणोपरांत (Posthumous) सम्मान से नवाज़ा गया है। यह भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। 
यह सम्मान राष्ट्रपति द्वारा भारत के गणतंत्र दिवस के अवसर पर घोषित किया गया था। 
उनके परिवार (पत्नी रीना मुखोपाध्याय और बेटे कृष्णेंदु मुखोपाध्याय) को यह सम्मान प्राप्त करने पर गर्व और खुशी व्यक्त की गई। 
🎭 जीवन परिचय (Biography in Hindi)
🧑‍🎨 प्रारंभिक जीवन
पूरा नाम: हरी माधब मुखोपाध्याय
जन्म: 3 अप्रैल 1941, बालुरघाट, बंगाल प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत (अब पश्चिम बंगाल, भारत) में हुआ था। 
वे पश्चिम बंगाल के बालुरघाट के हैं, जहाँ उन्होंने अपनी शिक्षा और प्रारंभिक थिएटर रुचि विकसित की।
🎭 थिएटर करियर और योगदान
🎬 थिएटर में योगदान
हरी माधब मुखोपाध्याय एक प्रसिद्ध थिएटर कलाकार, नाटककार, निर्देशक और थिएटर आयोजक थे। 
उन्होंने ट्रितिर्थ (Tritirtha) नामक थिएटर समूह की स्थापना की, जिसने कई यादगार नाटकों को मंच पर लाया। 
उनके निर्देशन और अभिनय में करीब 58 से अधिक नाटक प्रस्तुत किए गए, जिनमें Tin Bigyani, Jal, Galileo और Debangshi शामिल हैं। 
वे केवल अभिनेता ही नहीं थे — बल्कि नैरेटर, संगीतकार, लाइटिंग डिजाइनर, सेट और कॉस्ट्यूम डिजाइनर जैसे कई रोल भी निभाते थे, जिससे हर प्रोडक्शन को एक संपूर्ण रूप मिलता था। 
📚 शैक्षणिक और सामाजिक जीवन
वह प्रोफेसर भी थे और 1967 में बालुरघाट कॉलेज में शिक्षक के रूप में जुड़े थे। 
थिएटर के साथ-साथ उन्होंने छात्रों में कला और संस्कृति के प्रति जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 
🏆 पुरस्कार और सम्मान
पुरस्कार
वर्ष / विवरण
संगीत नाटक अकेडमी पुरस्कार (Sangeet Natak Akademi Award)
2007 – थिएटर निदेशक के रूप में प्रमुख योगदान के लिए मिला सम्मान। 
पद्मश्री (Padma Shri, Posthumous)
2026 – भारतीय सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए मरणोपरांत सम्मान। 
🕯️ निधन
हरी माधब मुखोपाध्याय का निधन 17 मार्च 2025 को हुआ। 
📌 उनके योगदान का महत्व
🎭 थिएटर के प्रति समर्पण: घरेलू और व्यावसायिक थिएटर दोनों को उन्होंने एक मंच दिया। �
📖 नाटकों और लेखन में वृहत योगदान: लगभग साठ नाटकों के लेखक और निर्देशक रहे, जो कला प्रेमियों के लिए मार्गदर्शक हैं। �
🌟 पश्चिम बंगाल और उत्तर बंगाल में कला आंदोलन के अग्रदूत: उन्होंने थिएटर को एक सामाजिक आंदोलन के रूप में बढ़ावा दिया

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