PADMSRI RAGHUPAT SINGH
Raghupat Singh (रघुपत सिंह)
🌾 रघुपत सिंह — जीवनी (Biograph
👤 कौन थे रघुपत सिंह?
रघुपत सिंह उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद (Moradabad) जिले के समाथल गाँव (Bilari tehsil) के एक प्रतिष्ठित किसान और कृषि विशेषज्ञ थे, जिन्हें भारत में सस्टेनेबल (सतत) कृषि, बीज संरक्षण और नई फसल विविधता विकसित करने के लिए जाना जाता है।
🪴 प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
रघुपत सिंह का जन्म लगभग 1940 के आसपास उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में हुआ माना जाता था।
उन्होंने डबल एम.ए. (MA) जैसी उच्च शिक्षा प्राप्त की, लेकिन सरकारी नौकरी की बजाय कृषि और खेतों की सेवा को अपनाया।
🌱 कृषि के प्रति समर्पण
रघुपत सिंह ने लगभग छह दशक (60+ साल) अपने जीवन को कृषि और बीज संरक्षण को समर्पित किया।
उन्होंने 55 से अधिक दुर्लभ या लगभग विलुप्त सब्जी प्रजातियों को पुनर्जीवित किया और लगभग 100 नई फसल विविधताएँ विकसित कीं।
🧑🌾 महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ और योगदान
✔ उन्होंने बीज संरक्षण और पारंपरिक कृषि ज्ञान को बचाया और उसे आधुनिक तकनीकों से जोड़ा।
✔ उन्होंने राजमा (kidney beans) जैसे पौधों के उन्नत रूप, अनोखी लौकी (bottle gourd) की 1.5 मीटर से ज्यादा लंबी किस्म और अन्य सब्जी-बोन्डवाले पौधे विकसित किए।
✔ उनके तरीकों में प्राकृतिक और मौसम-अनुकूल खेती, रासायनिक-कम खेती तकनीकें, और बीज सहेजने/संरक्षण की परंपरा शामिल थी, जिससे छोटे किसानों की आय और मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हुआ।
✔ उन्होंने लगभग 3 लाख किसानों को प्रशिक्षित और मार्गदर्शन किया, जिससे सतत खेती और जैव विविधता का व्यापक प्रसार हुआ।
🪔 पद्मश्री सम्मान (Posthumous Padma Shri 2026)
रघुपत सिंह को 2026 में मरणोपरांत (Posthumously) भारत सरकार द्वारा “पद्मश्री” से सम्मानित किया गया।
यह सम्मान उन्हें कृषि में उनके असाधारण योगदान — विशेष रूप से बीज संरक्षण, फसल विविधता की रक्षा और सतत खेती के लिए मिला। �
पद्मश्री भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, जिसे राष्ट्र के गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया जाता है।
🌿 उनका प्रभाव और विरासत
🌾 बीज संरक्षण और कृषि जैव विविधता
रघुपत सिंह ने खेती के क्षेत्र में यह सिद्ध किया कि बीज संरक्षण और पारंपरिक कृषि ज्ञान नई-नई बहुमूल्य किस्में विकसित करने में कितना प्रभावी हो सकता है।
👨👩👦 किसानों को मार्गदर्शन
उन्होंने छोटे और मध्यम कृषकों को प्राकृतिक तरीके और मौसम-अनुकूल खेती के अभ्यास के लिए मार्गदर्शन किया, जिससे कई किसानों की आय और कृषि प्रणाली में सुधार हुआ।
🌍 सतत और प्रकृति-मित्र खेती का उदाहरण
उनके तरीकों में रसायनों पर कम निर्भरता, पारंपरिक बीजों का संरक्षण, और मिट्टी की क्षमता को बचाये रखना शामिल रहा — जो आज की सतत कृषि रणनीतियों के मूल अंग माने जाते हैं।

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