IS INDIA A HINDU COUNTRY BY NATURE?
भारत को “स्वभावतः हिंदू राष्ट्र” कहा जाए या नहीं—यह प्रश्न ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और संवैधानिक—तीनों दृष्टियों से समझने योग्य है। इस विषय को भावनाओं के बजाय तथ्यों और संतुलित तर्कों के साथ देखना ज़रूरी है।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से देखें तो भारत की सभ्यता अत्यंत प्राचीन है, जिसकी जड़ें वैदिक काल, सिंधु–सरस्वती सभ्यता, उपनिषद, रामायण–महाभारत और अनेक दर्शन परंपराओं में मिलती हैं। “हिंदू” शब्द मूलतः कोई संकीर्ण धार्मिक पहचान नहीं था, बल्कि यह सिंधु नदी के पार रहने वाले लोगों के लिए प्रयुक्त भौगोलिक-सांस्कृतिक पहचान थी। समय के साथ इसमें विविध दर्शनों—जैसे शैव, वैष्णव, शाक्त, जैन, बौद्ध आदि—का समावेश हुआ। सहिष्णुता, अनेकता में एकता, कर्म, धर्म और अहिंसा जैसे मूल्य भारतीय जीवन-पद्धति का हिस्सा बने। इस अर्थ में कहा जा सकता है कि भारत की संस्कृति का आधार व्यापक रूप से हिंदू सभ्यता से पोषित रहा है।
लेकिन “हिंदू राष्ट्र” का प्रश्न केवल संस्कृति तक सीमित नहीं है; इसका सीधा संबंध आधुनिक राष्ट्र-राज्य और संविधान से है। भारत का संविधान 1950 में लागू हुआ, जिसने भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया। यहाँ “पंथनिरपेक्षता” का अर्थ धर्म-विरोध नहीं, बल्कि सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान है। भारतीय राज्य किसी एक धर्म को राज्य-धर्म नहीं मानता और न ही किसी धर्म के आधार पर नागरिकों के अधिकार तय करता है। संविधान का अनुच्छेद 25 से 28 तक सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है।
भारत की सामाजिक संरचना भी बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक है। यहाँ हिंदू बहुसंख्यक हैं, परंतु मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, यहूदी सहित अनेक समुदाय सदियों से रहते आए हैं और भारतीय पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं। भारत की “राष्ट्रीयता” किसी एक धर्म पर आधारित नहीं, बल्कि साझा इतिहास, संघर्ष, स्वतंत्रता आंदोलन और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित है। स्वतंत्रता संग्राम में विभिन्न धर्मों के लोगों ने समान रूप से भाग लिया—यह भारत की समावेशी पहचान को दर्शाता है।
अतः यदि “स्वभावतः हिंदू” का अर्थ भारत की सांस्कृतिक आत्मा, जीवन-दर्शन और परंपराओं से है, तो यह कहना आंशिक रूप से सही हो सकता है कि भारतीय संस्कृति पर हिंदू सभ्यता की गहरी छाप है। किंतु यदि “हिंदू राष्ट्र” का अर्थ एक ऐसा राज्य है जहाँ एक ही धर्म को आधिकारिक या सर्वोच्च माना जाए, तो आधुनिक भारत उस परिभाषा में फिट नहीं बैठता। भारत का स्वभाव बहुलतावादी है—जहाँ विविधता को स्वीकार किया जाता है और सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए जाते हैं।
निष्कर्षतः भारत न तो किसी एक धर्म का राष्ट्र है और न ही केवल धार्मिक पहचान से परिभाषित किया जा सकता है। भारत की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता, सहिष्णुता और संविधान में निहित समानता के सिद्धांत में है। यही भारत की आत्मा और उसका “स्वभाव” है।
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