HARSHANKAR PARSAI

 हरिशंकर परसाई हिंदी साहित्य के सबसे प्रमुख व्यंग्यकारों में से एक थे, जिन्होंने व्यंग्य को मात्र हास्य-मनोरंजन से ऊपर उठाकर समाज की गहरी विसंगतियों, पाखंड, राजनीति और रूढ़िवाद पर तीखी लेकिन सटीक टिप्पणी करने वाली विधा बनाया। उनकी लेखनी सरल, बोलचाल वाली और आम आदमी की भाषा में थी, जो सीधे दिल तक उतरती थी।

जीवन परिचय:

हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त 1924 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के जमानी (या जमानी) नामक छोटे से गाँव में हुआ था (इटारसी के निकट)। उनका परिवार साधारण ब्राह्मण परिवार था। पिता का नाम झुमकलाल परसाई और माता का नाम चंपा बाई था। बचपन में ही उन्होंने बड़े दुख झेले—1936-37 में प्लेग महामारी में माँ की मृत्यु हो गई, जब वे मात्र 13 साल के थे। कुछ समय बाद पिता भी लाइलाज बीमारी से चल बसे। चार छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। आर्थिक तंगी के कारण उन्होंने मैट्रिक के समय से ही नौकरी शुरू कर दी और पढ़ाई जारी रखी।

उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया। शुरुआत में उन्होंने विभिन्न नौकरियाँ कीं—18 साल की उम्र में जंगल विभाग में क्लर्क, फिर खंडवा के न्यू हाई स्कूल में अध्यापक, जबलपुर में स्पेंस ट्रेनिंग कॉलेज और मॉडल हाई स्कूल में शिक्षण। 1942 में सरकारी नौकरी छोड़ी, 1943-47 तक प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाया। 1947 के आसपास उन्होंने पूर्णकालिक स्वतंत्र लेखन अपनाया और नौकरी छोड़ दी।

वे जबलपुर में बस गए। उन्होंने 'वसुधा' नामक साहित्यिक मासिक पत्रिका निकाली, जो हिंदी जगत में काफी लोकप्रिय हुई, लेकिन आर्थिक नुकसान के कारण बंद हो गई। बाद में वे 'देशबंधु' अखबार में 'परसाई से पूछें' कॉलम चलाते रहे, जहाँ वे पाठकों के सवालों के व्यंग्यात्मक जवाब देते थे।

परसाई जी अविवाहित रहे और जीवनभर संघर्ष करते हुए परिवार की देखभाल की। उनका निधन 10 अगस्त 1995 को जबलपुर में हुआ। वे 70-71 वर्ष के थे।

साहित्यिक योगदान और प्रमुख कृतियाँ:

परसाई जी मुख्य रूप से व्यंग्यकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाया और इसे सामाजिक-राजनीतिक बदलाव का हथियार बनाया। उनकी रचनाएँ हल्की हँसी के साथ गहरी चोट करती हैं। वे कहते थे कि व्यंग्य "सामाजिक विसंगतियों का आईना" है।

प्रमुख कृतियाँ:

व्यंग्य संग्रह — सुनो भाई साधो, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, भोलाराम का जीव, विकट कवि, सदाचार का ताबीज, पगडंडियों का जमाना, शिकायत मुझे भी है, बेईमानी की परत, और अंत में, आदि।

कहानी संग्रह — हँसते हैं, रोते हैं; जैसे उनके दिन फिरे।

उपन्यास — रानी नागफनी की कहानी, तट को खोज।

अन्य — प्रेमचंद के फटे जूते (निबंध), मुक्तिबोध: एक संस्मरण (संस्मरण), आदि।

उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार (व्यंग्य के लिए), मध्य प्रदेश शासन का शिक्षा सम्मान, और जबलपुर विश्वविद्यालय से मानद डी.लिट् मिला।

परसाई जी की भाषा सरल, देसी, चुटीली और बोलचाल वाली थी—कोई क्लिष्ट शब्द नहीं, सीधे पाठक से बात करने जैसा अंदाज। वे कहते थे, "व्यंग्य वह तीर है जो हँसते-हँसते सीने में उतर जाए।" आज भी उनकी रचनाएँ प्रासंगिक हैं, क्योंकि समाज की विसंगतियाँ वैसी ही बनी हुई हैं।

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