CONSOLIDATED FUND OF STATE GOVERNMENTS IN INDIA

 भारत में राज्य सरकार की संचित निधि (Consolidated Fund of State Government in India)

भारत में प्रत्येक राज्य सरकार की अपनी संचित निधि होती है, जिसे राज्य की संचित निधि (Consolidated Fund of the State) कहा जाता है। इसका संवैधानिक प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 266(1) में किया गया है। राज्य सरकार की लगभग सभी आय और व्यय इसी निधि के माध्यम से संचालित किए जाते हैं, इसलिए यह राज्य की वित्तीय व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण निधि मानी जाती है।

राज्य की संचित निधि में राज्य सरकार की समस्त आय जमा होती है। इसमें राज्य कर जैसे राज्य वस्तु एवं सेवा कर (SGST), बिक्री कर (जहाँ लागू), आबकारी शुल्क, स्टांप और पंजीकरण शुल्क, वाहन कर, भूमि राजस्व आदि शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, केंद्र सरकार से प्राप्त करों में राज्य का हिस्सा, केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए अनुदान, तथा राज्य द्वारा लिए गए ऋण और उधारी भी इसी निधि में जमा किए जाते हैं।

राज्य की संचित निधि से सरकारी व्यय किया जाता है। इसमें राज्य प्रशासन के संचालन का खर्च, कर्मचारियों के वेतन और पेंशन, पुलिस व कानून-व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ, कृषि और ग्रामीण विकास, सिंचाई, सड़कें, बिजली, शहरी विकास तथा विभिन्न सामाजिक कल्याण योजनाओं पर होने वाला व्यय शामिल है। राज्य सरकार की सभी प्रमुख विकासात्मक और गैर-विकासात्मक गतिविधियाँ इसी निधि से वित्तपोषित होती हैं।

संविधान के अनुसार, राज्य की संचित निधि से कोई भी धन राज्य विधानमंडल की स्वीकृति के बिना नहीं निकाला जा सकता। प्रत्येक वित्तीय वर्ष में राज्य सरकार विधानमंडल के समक्ष वार्षिक बजट प्रस्तुत करती है, जिसमें प्रस्तावित आय और व्यय का विस्तृत विवरण होता है। विधानमंडल द्वारा अनुदान मांगें (Demands for Grants) पारित किए जाने और विनियोग विधेयक (Appropriation Bill) के अधिनियमन के बाद ही निधि से धन निकासी संभव होती है।

यह निधि राज्य की अन्य दो निधियों—राज्य की आकस्मिक निधि (Contingency Fund of the State) और राज्य के सार्वजनिक लेखा (Public Account of the State)—से भिन्न होती है। आकस्मिक निधि आपात खर्चों के लिए होती है, जबकि सार्वजनिक लेखा में जमा धन सरकार का स्वामित्व नहीं होता।

निष्कर्षतः, राज्य की संचित निधि राज्य सरकार की वित्तीय रीढ़ है। यह न केवल राज्य के प्रशासन और विकास को संचालित करती है, बल्कि विधानमंडल के नियंत्रण के माध्यम से वित्तीय अनुशासन, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही भी सुनिश्चित करती है।

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