CONTINGENCY FUND OF STATE GOVERNMENTS IN INDIA

 भारत में राज्य सरकार की आकस्मिक निधि (Contingency Fund of State Government)

भारत में राज्य सरकारों की आकस्मिक निधि (Contingency Fund of State Government) का उद्देश्य अचानक उत्पन्न होने वाले आपात या अप्रत्याशित व्ययों को तुरंत पूरा करना है। इसका संवैधानिक प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 267(2) में किया गया है। यह निधि राज्य सरकार को ऐसी परिस्थितियों में त्वरित वित्तीय सहायता प्रदान करती है, जहाँ विधानमंडल की पूर्व स्वीकृति लेना संभव नहीं होता।

राज्य की आकस्मिक निधि का स्वामित्व राज्यपाल (Governor) के पास होता है, किंतु इसका संचालन राज्य सरकार द्वारा किया जाता है। प्रत्येक राज्य में इस निधि की अधिकतम राशि संबंधित राज्य विधानमंडल द्वारा कानून बनाकर निर्धारित की जाती है। इसलिए अलग-अलग राज्यों में आकस्मिक निधि की सीमा भिन्न-भिन्न हो सकती है। समय-समय पर राज्यों द्वारा इस राशि में संशोधन भी किया जाता है।

इस निधि का उपयोग मुख्यतः प्राकृतिक आपदाओं—जैसे बाढ़, भूकंप, चक्रवात, सूखा, भूस्खलन आदि—के दौरान राहत, बचाव और पुनर्वास कार्यों के लिए किया जाता है। इसके अतिरिक्त, अचानक उत्पन्न प्रशासनिक आवश्यकताओं, कानून-व्यवस्था से जुड़े तात्कालिक खर्चों, महामारी या अन्य सार्वजनिक आपात स्थितियों में भी इस निधि का प्रयोग किया जा सकता है। इसका मूल उद्देश्य राज्य प्रशासन की निरंतरता बनाए रखना और संकट की घड़ी में तुरंत निर्णय व कार्रवाई को संभव बनाना है।

राज्य की आकस्मिक निधि से किया गया व्यय अस्थायी प्रकृति का होता है। जब परिस्थितियाँ सामान्य हो जाती हैं, तब राज्य सरकार विधानमंडल से अनुदान की स्वीकृति प्राप्त करती है। इसके बाद उतनी ही राशि राज्य की संचित निधि (Consolidated Fund of the State) से निकालकर आकस्मिक निधि में वापस जमा कर दी जाती है। इस प्रक्रिया से वित्तीय अनुशासन, पारदर्शिता और संवैधानिक नियंत्रण सुनिश्चित होता है।

यह भी उल्लेखनीय है कि राज्य की आकस्मिक निधि, राज्य की अन्य दो प्रमुख निधियों—राज्य की संचित निधि और राज्य के सार्वजनिक लेखा (Public Account of the State)—से अलग होती है। आकस्मिक निधि केवल आपात स्थितियों के लिए होती है, जबकि अन्य निधियाँ नियमित आय-व्यय और जमा राशियों से संबंधित होती हैं।

निष्कर्षतः, राज्य सरकार की आकस्मिक निधि एक अत्यंत महत्वपूर्ण वित्तीय व्यवस्था है। यह आपदा और संकट की परिस्थितियों में राज्य सरकार को त्वरित संसाधन उपलब्ध कराती है, साथ ही विधानमंडल की बाद की स्वीकृति के माध्यम से लोकतांत्रिक जवाबदेही और वित्तीय अनुशासन भी बनाए रखती है।

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