VIMAL NATH

 

विमलनाथ (Vimalnath)

भगवान विमलनाथ जैन धर्म के 13वें तीर्थंकर थे। उनका जन्म अयोध्या नगरी में राजा कृतवर्मा और रानी शुभदेवी के यहाँ हुआ था। वे इक्ष्वाकु वंश के महान और पुण्यात्मा राजा के पुत्र थे। उनका जन्म मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को हुआ था। जन्म के समय ही उनके शरीर से दिव्य प्रकाश निकलने लगा, जिससे ज्ञात हो गया कि वे एक महान आत्मा हैं।

विमलनाथ बचपन से ही बहुत शांत, विनम्र और धार्मिक प्रवृत्ति के थे। वे ज्ञान प्राप्ति, ध्यान और आत्मविकास में विशेष रुचि रखते थे। युवावस्था में उन्होंने कुछ समय तक राज्य की जिम्मेदारियाँ निभाईं और प्रजा के कल्याण के लिए कार्य किए।

लेकिन जैसे-जैसे वे बड़े हुए, उन्होंने संसार की नश्वरता और मोह-माया को पहचाना और आत्मा की मुक्ति के लिए वैराग्य का मार्ग चुना। उन्होंने 50 वर्ष की आयु में राज-पाठ त्याग कर दीक्षा ली और तपस्वी जीवन को अपनाया। उन्होंने कई वर्षों तक कठिन तपस्या की और अंततः उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई।

भगवान विमलनाथ ने पंचमहाव्रतों—अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह—का उपदेश दिया और अनेक लोगों को मोक्षमार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। वे समवसरण में बैठकर जीवों को धर्म का ज्ञान कराते थे।

उनका प्रतीक चिन्ह सूअर (वराह) है, जो उनकी मूर्तियों में अंकित होता है। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने सम्मेद शिखर पर जाकर निर्वाण प्राप्त किया।

भगवान विमलनाथ का जीवन संयम, त्याग और आत्मज्ञान का प्रतीक है। वे आज भी जैन धर्म के श्रद्धालु अनुयायियों के लिए भक्ति और प्रेरणा का स्रोत हैं।

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